माँ , माँ – मेरी प्यारी माँ , क्या तुम मुझे चाहती नहीं हो माँ…

आखिर तुम भी तो इक लड़की थी, फिर क्यों मुझे मार रही हो माँ।

मेरे कन्या होने का है यह कैसा गम, जो शिला सामान तू जम गयी…

क्या मुझे जीने का जरा सा हक नहीं, या ममता तेरी है थम गयी।।

मुझमे भी तो प्राण है, दिया ईश्वर ने यह वरदान है…

बेटियों से ही घर सजता है, इन्ही से वंश आगे चलता है।

वेदों में देवियों का भी गुणगान है, फिर क्यूँ इन्हें अपने अहम् पर इतना अभिमान है…

मारने से हमें नहीं हिचकिचाते, हम तो केवल नन्ही सी जान है।।

लड़कियां भी लड़कों के सामान होती है, फिर क्यों यह दुनिया इतना डरती है…

कन्याओं की पूजा तो करती है, और बेटियों से ही घृणा करती है !

यह दुनिया नैतिक मूल्यों पे है चलती, फिर क्यों पत्थर है दुनिया वालों का दिल…

विवश करती इक माँ को बनने में, उसकी ही बेटी का कातिल।।

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माँ, इक बाप की दुलारी होती है बेटी, आँखों का तारा होती है बेटी।

दुख में मुस्कुराना सीखाती है बेटी, दर्द में भी सँभालने आती है बेटी।

घरों में खुशियाँ लाती है बेटी, फिर क्यों पैदा होने से पहले मर जाती है बेटी।

यह तो सभी जानते है, नारी की शक्ति को पहचानते है।

कोई शहीद होती है, देश की रक्षा करते-करते।

कोई देश का भार संभालती है, कंधो पर जिम्मेबारी लेके।

फिर भी – लकड़ियों को ही कलंक मानते है, लडको को लाडले बना कर –

– माँ अम्बा की नजरों में, बेटियों को ही नदी-नालों में फैकने की ठानते है।

जरा सा विचार करके तू देख माँ, कहाँ होती क्या करती तू माँ।

है आज जो भी पास तेरे माँ, क्या पाया तूने होता कभी माँ।

अगर तेरे भी माता-पीता ने, तुझे भी त्यागा होता माँ।

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तू तो ऐसी न थी माँ, सामाजिक बुराइयों से तू न डरी…

मुकाम हासिल किये तूने सभी, भ्रस्टाचार के खिलाफ हुई डट के खड़ी।

बाल-विवाह व दहेज़-प्रथा का विरोध किया, साथ दिया उसका था जो सही…

हिम्मत न हiरी तूने कभी, फिर क्यों माँ आज भ्रूण हत्या तू कर रही।।

तेरी आँखों से दुनिया मेने है देखी, साँसों से खुशबू को महसूस किया…

पानी का बहना – पक्षियों का चहचहाना भी सुना,

क्या होती ख़ुशी तुझसे ही जान लिया।

कोमल स्पर्श में आता है कितना मजा – अनुभव मेने भी किया,

जब नग्न पेरों से घास छुई…

सच में बहूत खुबसूरत है यह दुनिया – इसीलिए यहाँ आने की,

मेरी भी तमन्ना हूई।।

उंगली थाम तेरी चाहती हूँ चलना, भरी धुप में छिपने को तेरा आँचल हो

चाहती हूँ मैं भी आसमां में उड़ना, मेरे सपनो को भी अरमानों के पर दो

फूल सी कोमल हूँ मैं भी, कली को जरा सा खिलने दो

मैं भी नन्ही सी पारी हूँ , इस परी के पर मत काटो

है माँ यही विनती बस तुमसे, मुझे भी जीवन का वर दो

चाहती हूँ में भी जीना, परी के पर मत काटो