surendra-sharma-272x300हास्य कविताओं की इस श्रृंखला में इस बार हाजिर है सुरेंद्र शर्मा की एक और बेहतरीन कविता. पति पत्नी एक-दूसरे के सबसे बड़े साथी होते हैं. उनके बीच नोक-झोंक की प्यार भरी झड़पी होनी जायज होती है. इसी तरह की एक लड़ाई को सुरेंद्र शर्मा ने अपने ढ़ंग से दिखाया है.

मैनें अपनी पत्नी से कहा, ” संत महात्मा कह गये हैं……

ढोल, गंवार, शुद्र, पशु और नारी ये सब ताड़न के अधिकारी.

इन सभी को पीटना चाहिये!! “

इसका अर्थ समझती हो या समझायें?

पत्नी बोली

“हे स्वामी इसका मतलब तो बिलकुल साफ है

इसमें एक जगह मैं हूँ और चार जगह आप हैं.

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पिताजी ने बेटे को बुलाया पास में बिठाया,

बोले आज राज की मैं बात ये बताऊंगा।

शादी तो है बरबादी मत करवाना बेटे,

तुमको किसी तरह मैं शादी से बचाऊंगा।

बेटा मुस्कुराया बोला ठीक फरमाया डैड,

मौका मिल गया तो मैं भी फर्ज ये निभाऊंगा।

शादी मत करवाना तुम कभी जिन्दगी में,

मैं भी अपने बच्चों को यही समझाऊंगा।

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एक नए अखबार वाले सर्वे कर रहे थे

मैंने कहा मैं भी खूब अखबार लेता हूं

जागरण, भास्कर, केसरी ओ हरिभूमि

हिन्दी हो या अंगरेजी सबका सच्चा क्रेता हूं

पत्रकार बोला इतनों को कैसे पढ़ते हैं

मैंने कहा ये भी बात साफ कर देता हूं

पढ़ने का तो कोइ भी प्रश्न ही नहीं है साब

मैं कबाड़ी हूं पुराने तोलकर लेता हूं